Thursday, September 29, 2011

ख़ुदा ..



















ख़ुदा  ..

है  ख़ुदा  एक  शब्द  पर  इस  शब्द  की  है  शक्ल  क्या  ..
या  ख़ुदा  इस  नाम  की  ज़ेरो  ज़बर  मुझको  बता  ..
पुण्य  के  फल  में  ख़ुदा  और  पाप  में  भी  है  ख़ुदा ..
हर  एक   सही  हर  एक  ग़लत  के  हाल  में  शामिल  ख़ुदा ..
है  रिंद  की  फ़रियाद  में  पाखण्ड  में  भी  है  ख़ुदा ..
है  गूँज  के  परवाज़  में  और  मौन  में  मद्धम  ख़ुदा ..
काग़ज़  पे  कलमों  सा  बयां  हाफ़िज़  कलम  भी  है  ख़ुदा  ..
नोटों पे  जीभों  से  चटे  बे - क़ायदा  भी   है  ख़ुदा ..
चारों  दिशा  चारों  पहर  चौकोर  सा  दिखता  ख़ुदा  ..
कोने  पकड़  में  चल  पड़ा  और  गोल  बन  बैठा  ख़ुदा  ..
है  मर्म  के  आग़ाज़  में  दर्द - ए - दफ़न  भी  है  ख़ुदा ..
बच्चे  के  खिलते  होंठ  पर  तितली  सा  उड़ता  है  ख़ुदा ..
अबला  के  लुटते  जिस्म पर बिजली  सा  गिरता  है  ख़ुदा ..
है  सुखन की  चोट  में  मरहम  उधारी  का  ख़ुदा  ..
जाहिल  की  बातों  के  असर  में  दम  भरे  दिन  भर  ख़ुदा ..
फ़सलों  की  पहली  भोर  में  बंजर  ज़मीं  पर  भी  ख़ुदा ..
फ़िर्दौस  की  खिड़की  से  ताकता  है  मदारी  सा  ख़ुदा  ..
झगड़े  फ़सादों  की  सुराही  में  बने  मदिरा  ख़ुदा  ..
शाही  सा  बैठा  तख़्त  पर  निर्बल  के  बिगड़े  वक़्त  पर ..
रस्साकसी  के  खेल  में  दर्शक  बना  है  ये   ख़ुदा  ..
है  ख़ुदा  हर  अक्स  में  शीशे  में  झूठा  भी  ख़ुदा  ..
लफ़्ज़ों  के  उलझे  जाल  में  उलझा  गया  मुझको  ख़ुदा  ..
या  ख़ुदा  इस  नाम  का  मतलब  असल  मुझको  बता .....

***************** विक्रम  चौधरी *****************************  

   

Sunday, September 18, 2011

" आज़ादी "















  "  आज़ादी  "


कुछ  और  नहीं  माँगा  है  मैंने 
मांगी   है  बस  अपने  हक़  की  आज़ादी ....

फूल  के  खुद - ब - खुद  टूटने  की  आज़ादी 
सहरा  के  खुद - ब - खुद  फूटने  की  आज़ादी 
पंछी  के  खुद - ब - खुद  उड़ने  की  आज़ादी 
शब्द  से  तहज़ीब  के  जुड़ने  की  आज़ादी 

कुछ  और  नहीं  माँगा  है  मैंने 
मांगी   है  बस  अपने  हक़  की  आज़ादी ....

अम्न - ओ - फ़िज़ा  में  दिल  धड़कने  की  आज़ादी 
बच्चे  के  रोने  पे  माँ  के  तड़पने  की  आज़ादी 
सीने  की  आह  को  सुलगने  की  आज़ादी 
लेम्प पोस्ट  से  इश्तेहार  छटकने  की  आज़ादी 
भीड़  में  अखबार  सा  बनने  की  आज़ादी 

कुछ  और  नहीं  माँगा  है  मैंने 
मांगी   है  बस  अपने  हक़  की  आज़ादी ....

तो  जाओ  कहीं  से  ले  कर  आओ  
मेरे  गुस्सा  होने  पर  मेरे  चिल्लाहने  की  आज़ादी  
मेरे  इन्सां  दिखने  पर  मेरे  इन्सां  होने  की  आज़ादी  
खुली  सड़कों  पे  अबला  के  बेख़ौफ़  चलने  की  आज़ादी 
सस्ते  ईमां  को  तड़ीपार  करने  की  आज़ादी 

कुछ  और  नहीं  माँगा  है  मैंने 
मांगी   है  बस  अपने  हक़  की  आज़ादी ....

बिकते  जिस्मों  के  सौदे  तबाह  करने  की  आज़ादी  
अक्ल  के  मुद्दे  पे  शक्लों  की  फ़ेहरिस्त  से  आज़ादी 
हवस  के  कुओं  को  पत्थर  से  भरने  की  आज़ादी  
जुबां  के  चलने  पे  बहती  सिफ़ारिश  से  आज़ादी 

कुछ  और  नहीं  माँगा  है  मैंने 
मांगी   है  बस  अपने  हक़  की  आज़ादी ....

सुबह  के  खिलने  पे  जी  भर  के  जीने  की  आज़ादी 
बुरी  आदत  पे  शर्मसार  होने  की  आज़ादी 
वतन  को  काग़ज़  से  छुड़ा  कर  दिल  पे  लिखने  की  आज़ादी 
ज़मीं  के  दामन  से  सरहद  को  मिटा  देने  की  आज़ादी 

कुछ  और  नहीं  माँगा  है  मैंने 
मांगी   है  बस  अपने  हक़  की  आज़ादी ....

******************** विक्रम  चौधरी *****************************

Tuesday, March 15, 2011

" कई साल गुज़रे .. "





कई  साल  गुज़रे  .. 
कई  मौसम  आये 
कई  मौसम  गए ..
कुछ  साथ  रह  गए  
कुछ  यादें  साथ  ले  गए ....
हर  बार  मेरे  दरीचों  में  कुछ  नयी  खुशबू  लिए  मेरे  दोस्त  आया  करते  थे ....
सुबह  शाम  अपने  सफ़र  की  कहानी  के  धागों  में  मुझे  मोती  सा  पिरोया  करते  थे  ...
कभी  कभी  तो  रात  को  एक  साथ  खाब  में  डर  कर  नींद  खुल  जाती  थी ...  
मगर   हम  एक  दूसरे  की  हिम्मत  बंधा  कर  फिर  से  सो  जाते  थे ...
सुबह  होते  ही  एक  साथ  नाश्ता  भी  करते  और  दोपहर  को  खेल  कूद ....

हँसते  खेलते   यूँ  ही  दिन  गुज़रे ..
मीठे - कड़वे , सच्चे  - झूठे  
जैसे  भी  बन  जाए  बातों  का  ताना  बाना  
बस  लम्हे  जुड़  जाते  थे ..... 
पास  ही  की  झोंपड़ी  में  काका   काकी   भी  रहते  थे ...
बड़े  पते  के  नुस्खे  आते  जाते  कह  जाते  थे ...
साफ़  दिल  के  थे  काका  , काकी  से  बहुत  प्यार  करते  थे ...
काकी  की  एक  खाँसी  पर  पूरे  मोहल्ले  को  सर  पर  उठा  लिया  करते  थे ...
मगर   बुढ़ापे   की  मार  से  बच  ना  पायी  काकी  ...
बस  अब  सारा  दिन  मेरे  दोस्तों  के  साथ  ही  काका   खेला  करते  थे  ....
और  हाँ ...  मेरे  दोस्तों  ने  भी  कोई  कसर  नहीं  छोड़ी  थी  उनको  परेशान  करने में  ...
दिन  भर  के  खेल  कूद  में   काका  की  सारी  झोंपड़ी  को  गन्दा  करके  ही  
शाम  को  मेरे  दरीचों  में  बैठक  जमाते  थे ..
उबासी  लेते  मेरे  दोस्त  सोते  वक़्त   बड़े  खूबसूरत  लगते  थे ... 

मगर  अचानक  एक  दिन  पिताजी   का  ट्रांसफ़र  हो  गया ... 
और  मै  उनके  साथ  दूसरे  शहर  चला  गया  ... 
आधे  रास्ते  तक  मेरे  दोस्तों  ने  मेरा  पीछा  किया  ...
मगर   वो   लौट  गए.....
शायद  मेरे  दरीचों  में  कुछ  किस्से   अभी  बाक़ी   रह  गए  थे ....
और  काका  भी  तो  थे  वहाँ  पर .... 

कई  साल  गुज़रे  .....
मौसम  फिर  आया   फिर  गया  ...
पिताजी  का  ट्रांसफ़र   फिर  हुआ  , उसी  शहर    में   ...
मेरी  ख़ुशी  का  ठिकाना  ना   था  .....
मैंने  बड़े  ज़ोर - शोर  से  तैय्यारी  करना  शुरू  कर  दिया  .....
भई..  मै   अपने   पुराने  दोस्तों  से  जो  मिलने  जा  रहा  था ....
मगर  अब  शहर  में  घोडा गाड़ी   की  जगह  ऑटो  रिक्शा    गया  था ...
ठेल  पर  बिकने  वाली  तरकारी  शो रूम   में   सज   रही  थी  ...
ऑटो  मेरे  घर  की  गली  में  मुड़ा  तो  देखा  ... 
कोई  ऊबड़  खाबड़  नहीं , पेट  का  पानी   यौं  का  त्यौं  ...
सड़क  , कांच  की   तरह  चमक  रही  थी .... 
और  जैसे  ही  घर  आया ... मैंने  घर  पर  एक  नज़र  डाली  .. 
तो  जैसे  मानो  पाँव  के  नीचे  की  ज़मीन  आसमान  में  बदल  गयी  हो ....
मै  भाग  कर  दरीचों  की  तरफ  दौड़ा ... 
आँखें  ठहर   सी  गयीं , वहाँ  का  सारा  नक्शा  ही  बदल  गया  था ....   
सब  खाली  खाली  होने  का  एहसास  ... 
एक  ही  पल  में  मेरे  शून्य  में  भीड़  हो  गयी ....
मै  मायूस  सी  सूरत  लिए  ज़मीन  से  सवाल  पूछते  पूछते  घर  से  बाहर  निकल  गया  ...
सड़क  के  सहारे   सहारे   दूर  तक  निकल  गया ....
शाम  हुई  , रात  हुई  .... मेरा  कोई  दोस्त  मुझसे  मिलने  नहीं  आया  ...
शायद  अब  वहाँ   कोई  नहीं   था  ...
और  हाँ  .... अब  मेरे  दरीचों  में  भी  वो   खुशबू   नहीं  थी  ... ना  पास   की  झोंपड़ी ...
काका  का  तो  पता  नहीं  .... 
पर  अब  उस  जगह  एक   शौपिंग  कॉम्पलेक्स  खुल   गया  है  .... 

----------------------------------- विक्रम  चौधरी --------------------------------------------------------
  





      

Thursday, September 24, 2009

" शाम का वक़्त था........."















शाम का वक़्त था.. सूरज की ठंडी ठंडी किरणों का ढलने का वक़्त था.. पंछी भी अपनी रहगुज़र के संग उड़ चले थे अपने परवाज़ की ओर ... समंदर की गहरी सी सांस लेने की आवाज़ कुछ ऐसे थी , की मानो कब से शाम के ढलने के इंतज़ार में बैठी हो... सब उड़ा उड़ा सा लग रहा था.. कहीं कुछ जुदा जुदा सा लग रहा था... दिन ख़त्म हुआ... शाम लौटी अपने आशियाने की पनाह में... रात बैठी उसका कब से इंतज़ार कर रही थी.. शायद कुछ मेरा ही आगाज़ कर रही थी... चाँद भी था चुप चुप सा.. अपनी ही दुनिया में गुमसुम सा ... देख रहा था मुझे बड़ी देर से , शाम के पंख निहारते हुए.. बैठा था वो भी अपनी रौशनी से मुझे रोशन करने के लिए... मगर ना जाने कब ये कमबख्त रात मुझे चकमा दे गयी... शाम होते ही ना जाने कहाँ ले कर मुझे सो गयी... मै खाब ही में चाँद को ताकता रहा ... खिली खिली चाँदनी को ना जाने क्यों अपनी झोली में भरता रहा ... अचानक से आँख खुली... जिसका डर था... होना वही था... मै चाँद को खाब में तकते तकते ना जाने कब अपने पाँव धुप में जला बैठा... खिली खिली चाँदनी को उस गर्म आँगन में रुला बैठा... पंछी भी वहीँ थे , मुझे देख कर वो भी हंस रहे थे.... कितना पागल है... देखो... मुद्दत हो गयी मगर इसको नींद ना आई.... हर बार चाँदनी चाँदनी करते हुए इस समंदर की रेत में छुप जाता है ... ना जाने किसको ढूंढता है... दिन को ही रात कहता है... देखो फिर जा रहा है... समंदर के किनारे ... फिर शाम को चाँद की ही ओर देखेगा... और फिर सो जाएगा इस रेत में.. लगता है....शायद पागल है ... खाब में ही चाँद को देखता है... अरे ! शाम हो गयी... चलो चलो... देर जायेगी... चाँद को भी तो देखना है.......


********************* विक्रम चौधरी ************************

Monday, September 21, 2009

" मोरे मन की हार........."









" मोरे मन की हार........."

मोरे मन की हार से मोरे मन की जीत …
कोरे कंठ की राख पे माटी भई पलीत …

आंसू से आंसू जुड़े नयन भये भयभीत …
छत पे चुघ चुघ बाजरा पंछी ढूंढे प्रीत …
पंख पे त्रिशूल काढे पंछी गावे गीत …
मन मेरा अघोर माँगे भड़के देह सीत …
खुर की नाल टाप छोड़े कोस होवे ढीट …
मेघ सूखी आग फूँके मौत खोवे रीत …

मोरे मन की हार से मोरे मन की जीत …
कोरे कंठ की राख पे माटी भई पलीत …

जगत मिथ्या.... करम मिथ्या.... धरम मिथ्या ....
सांच पे आँच पड़ी रे मौला ....
शर्म मिथ्या.... भरम मिथ्या.... जनम मिथ्या ....
आज पे गाज गिरी रे मौला ....

भोजन में ढूंढे केसर ....
भर मन मन जी इठ्लावे ....
कोयल के संग फिरूं मै ....
घट मन मन तू बहलावे ....

भोज पान बादरी की भूंख पे मसान है .…
भोर छान बावड़ी की धूप खूं कमान है .…

सब्र कर रे सब्र कर....
रे इंसान कुछ सब्र कर....
है धुंध में अटका जहां....
रे इंसान तू सब्र कर....

**************** विक्रम चौधरी ******************

“ आत्मा का हरण …..….”























“ आत्मा का हरण …..….”




जिस्म से आईने तक का फासला ….इंसान के वजूद का एक भ्रमित सच है …. जिसके भ्रम में हम खुद ही अपनी आत्मा का हरण कर लेते हैं .....
अपने रूप की परतों से ढकी अविश्वसनीय सूरत को हम , मन ही मन निहारते रहते हैं ... और अपने स्वार्थ और परिस्थितियों के अनुरूप जो रूप हमको चाहिए , उसका बड़ी ही खूबसूरती से आलिंगन कर लेते हैं , और ये भूल जाते हैं , की ये मात्र हमारी कल्पना है , कोई प्रकृति या इश्वर का सच नहीं ..... जिसे ओढ़ कर हम खुद को दुनिया का सबसे खूबसूरत इंसान समझ लेते हैं ........



और खुद ही अपनी आत्मा का हरण कर लेते हैं ..................



रौशनी हो या अँधेरा , सच की तस्वीर कहीं नहीं छुप सकती . मगर फिर भी हम रौशनी के अस्तित्व के समक्ष अँधेरे को अस्तित्व विहीन कर देते हैं . जबकि अँधेरा भी खुद में एक सम्पूर्ण संसार है ..........

बस अंतर इतना है की हमारी आँखें उस अँधेरे में अपने रूप को नहीं देख पाती … और एक ही पल में हम अँधेरे को नकार जाते हैं … क्योंकि वो हमे हमारी सुन्दर तस्वीर नहीं दिखाता .....… इसलिए हम अपनी ही मर्ज़ी से अपने संसार को रौशनी के हवाले करके …..



खुद ही अपनी आत्मा का हरण कर लेते हैं ……...….



कौन कहता है  कि आत्मा नहीं मरती … आत्मा मरती है … हाँ .... आत्मा मरती है ......
जब आत्मा का खून जिस्म की पनाह में जा कर रूप की झूंठी सुन्दरता को सहेजता है ,,, जब अर्थ की पैमाईश आत्मा की आजमाईश से होती है .... जब रिश्तों का भरम माया के जंजाल से निकल कर इंसान की फितरत में बदलता है ...... जब वक़्त की बिसात पर इंसान खुद बाज़ीगर बन कर चाल चलता है ...... जब अजन्मे बच्चे की हसरत पे इंसान खुद क़यामत के रास्ते खोल देता है ..... जब माँ की गोद में बैठ कर तिजारत की बात होती है ..... जब परमात्मा के बनाए क़ायदों पर इंसान सवाल उठाता है .........
तब ..... सच में आत्मा मर जाती है ..... किसी ने हरण किया है हमारी आत्मा का …. पता नहीं क्यों कुछ भी होने का एहसास ख़त्म हो रहा है …….. सब चलता हुआ दिखता है .... मगर इंसान खुद को जब रुका हुआ मान ले तो सच में हमे समझ लेना चाहिए .... कि  कहीं ना कहीं हमारे अन्दर कुछ ऐसा ग़लत हो रहा है ... जिसका कोई समाधान हमारे पास नहीं है …. और हाँ ..., जब हम किसी समस्या को सुलझाने में असमर्थ हो जाते हैं ..... या फिर ये कहें  कि उस समस्या का कोई हल ही नहीं है …. तो समझो …

सच में हमारी आत्मा का किसी ने हरण किया है ………….

ना जाने ये कैसा अनचाहा सच है … इंसान जिंदा तो है … मगर आत्मा का कहीं पता नहीं …. हम खुद ही अपने आप से दूर होने के रास्ते खोजते रहते हैं ….
कभी मंदिर में , कभी मस्जिद , कभी  गुरूद्वारे  में कभी गिरजा घर में …. तो कभी किसी ऐसी जगह जहाँ इश्वर के होने का प्रमाण मिलता हैं …. …...
हम खुद ही अलग अलग रूप में इस भ्रम का शिकार हैं ….. क्या ढूँढने निकल पड़े हैं …?  ये खुद को भी नहीं मालूम … और अगर किसी से पूछो , तो वही इंसान हमे इश्वर की अलग अलग परिभाषा समझा कर सन्तुष्ट करने की कोशिश करता है ... जो हमारी ही तरह इस भ्रम का शिकार है .......



और खुद ही अपनी आत्मा का हरण कर लेता है ...............



हर किसी को एक कठिन सी दिखने वाली सीड़ी ही सच नज़र आती है ….. कोई सीधे तरीके से आत्मा के रूप को समझना ही नहीं  चाहता ....…
बस एक बार … मात्र एक बार इंसान इश्वर को सीधे सीधे रास्ते समझने की कोशिश करे तो सब कुछ आसान हो सकता है …. मगर हम तो खुद ही उस तक पहुँचने के रास्ते को कठिन बनाते जा रहे हैं …. जबकि वो हमेशा हमारे ही साथ चलता , बैठता , उठता , खाता , पीता , सोता और सांस लेता है … वो हमसे एक पल के लिए भी दूर नहीं होता … मगर हम ही हैं …. जो इश्वर से दूरी बना कर चलते हैं ..... व्यर्थ के कर्म - काण्ड और नीतियों के वशीभूत हो कर हम अपनी आत्मा को इस क़ाबिल ही नहीं बनने देते  कि वो खुद हमसे बोल सके  कि  , मैं जिंदा हूँ .. और … मै ही इश्वर का एक सच्चा रूप हूँ … .
आत्मा सारा जीवन उस शरीर में धारण मन को ये समझाती रहती है ….  कि  बस एक बार वो अपनी आत्मा को महसूस तो करे ….. और देखे  कि  … सच खुली आँखें ज़यादा बताती हैं … या बंद आँखों से दिखने वाला आध्यात्मिक संसार सच्चा है ….. मगर नहीं … हमे शायद कुछ और ही चाहिए ….. हम कभी अपनी आत्मा को महसूस नहीं कर पायेंगे ..…
बस ... मन , दिमाग़ और  समाज  के  फलते  फूलते  जिस्म  के  श्रृंगार  के  अधीन  हो  कर  …..

खुद ही अपनी आत्मा का हरण करते रहेंगे ...... शायद यही हमारा सच है..……………


“ आत्मा एक ऐसा रूप है …. जिसे कभी ख़त्म नहीं किया जा सकता … … मगर हम खुद अपनी ही मूर्खता के वशीभूत हो कर …… उसके हरण की तैय्यारी कर लेते हैं ……
और हाँ … कभी कभी हम ऐसे जंजाल में फँस जाते हैं  कि  कब हमारी आत्मा का हरण हो जाता है … हमे पता ही नहीं चलता ……… आत्मा हो कर भी अपना प्रभाव भूल जाती है …. शरीर लगता है  कि मानो किसी शिकारी की क़ैद में हमेशा के लिए क़ैद हो गया है … और आत्मा शरीर को ढूँढने निकल पड़ी है … लेकिन वो तो खुद नहीं जानती  कि  उसका तो कब का हरण हो चुका है …. …. …. अब तो बस सब आईने की तरह है … दिखता तो सब है , मगर छूने का एहसास ख़त्म हो चुका है …....”



************** विक्रम चौधरी ***************

Saturday, September 19, 2009

“ कल्पना और हकीक़त …...”











“ कल्पना और हकीक़त …..” कल्पनाएँ कभी हकीक़त में नहीं बदलतीं , यदि उनमें यथार्थ का आधार न हो तो ….. जीवन की कल्पना ज़िन्दगी के संघर्ष पथ के चौराहों की एक ऐसी राहगीर है …जो हमेशा आपके साथ चलती है …मगर अनजाने में हम उसे हमसफ़र समझ बैठते हैं …….और यही भूल हमारे जीवन की सबसे बड़ी मूकदर्शिता बनती है ... जहाँ हम रेगिस्तान में दूर तक नज़र आते रेत के उन टीलों की तरह नज़र आते हैं ... जो तस्वीर में तो बहुत खूबसूरत लगते हैं ... मगर हकीक़त में वो खुद भी ना जाने कब से बरसात के आने का इंतज़ार कर रहे हैं , उन्हें भी नहीं पता ......... क्योंकि ज़िन्दगी एक कल्पना नहीं है …. उसे जीने के लिए हकीक़त में संघर्ष करना ही पड़ता है … लेकिन संघर्ष की कल्पना हमारा मन कभी नहीं करता ……….इसलिए कभी कभी व्यक्ति कल्पना और हकीक़त की कशमकश में ज़िन्दगी से बहुत दूर निकल जाता है …. जहां उसकी कल्पनाएँ ही उसे हमेशा कचोटती रहती हैं … और संघर्ष का सामना करने के लिए व्यक्ति का मस्तिष्क उदासीन हो जाता है ….और फिर एक बार संघर्ष की यथार्थ भूमि पर कल्पना की जीत हो जाती है ...….

और रण की लाल मिटटी , ज़िन्दगी को खुद ही अपनी आँखों के सामने दम तोड़ते हुए देखती रहती है ………

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